POEM NO. 228
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दोहावली भाग 2
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चन्दन हुआ 24 का, मन में ना राखे पाप |
अब तोसे का छुपाऊ, मन नाप सके तो नाप || 11 ||
चन्दन खुशबु में नही, खुशबु है चन्दन माय |
दौड़ दौड़ मृग ढूंढे, खुद उसे ना खुशबु मिल पाय || 12 ||
दौड़ दौड़ मृग ढूंढे, खुद उसे ना खुशबु मिल पाय || 12 ||
राख में पड़ा चन्दन, अश्तियों को खुशबु देत |
बिना काज मानव नही, जैसे बिना पानी के रेत || 13 ||
बिना काज मानव नही, जैसे बिना पानी के रेत || 13 ||
सुखा पड़ा है चन्दन, घिस सके जितना घिस |
मंदिर बाहर आश्रम है, फिर भी सोये तोहरे शीश || 14 ||
मंदिर बाहर आश्रम है, फिर भी सोये तोहरे शीश || 14 ||
चन्दन करता अभिनन्दन, मानव दिवस कई अपार |
सोवत सोवत वर्ष बिट गये, अब तार सके तो तार || 15 ||
सोवत सोवत वर्ष बिट गये, अब तार सके तो तार || 15 ||
चन्दन चन्दन सब करे, चन्दन बने ना कोई |
चन्दन घिस घिस कर भी, चन्दन तोरे माथे सोहे || 16 ||
चन्दन घिस घिस कर भी, चन्दन तोरे माथे सोहे || 16 ||
कट गयो चन्दन राजा ने बचवन ने
घिस गयो चन्दन तोरे शीश सजवाण ने
हवन,पूजा, अर्थी सजे, तोरे मान बढ़ावन ने
चन्दन चन्दन कई करे, कब पहचानेगा चन्दन ने || 17 ||
घिस गयो चन्दन तोरे शीश सजवाण ने
हवन,पूजा, अर्थी सजे, तोरे मान बढ़ावन ने
चन्दन चन्दन कई करे, कब पहचानेगा चन्दन ने || 17 ||
आपका शुभचिंतक
लेखक - राठौड़ साब "वैराग्य"
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11:49 AM 19/06/2014
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